आज के समय में जहाँ पारंपरिक खेती की लागत बढ़ती जा रही है, वहीं छत्तीसगढ़ के एक प्रगतिशील किसान ने अपनी दूरदर्शिता से खेती को एक मुनाफे वाले एग्री-बिजनेस में बदल दिया है। महासमुंद जिले के केशवा गांव के रहने वाले मोहन लाल चंद्राकर जो 55 वर्ष के है, वह स्वयं एक MBA डिग्री धारक हैं, पिछले 15 वर्षों से खेती में सक्रिय हैं और उन्होंने जैविक खेती के माध्यम से एक मिसाल कायम की है।
उन्होंने न केवल जैविक खेती को अपनाया, बल्कि बैंगनी धान और बैंगनी गेहूं जैसी पोषक फसलों को बढ़ावा देकर किसानों की आय में ऐतिहासिक वृद्धि की है।
नवाचार की शुरुआत: “न्यूट्री-पर्पल हार्वेस्ट”
मोहन लाल चंद्राकर ने “न्यूट्री-पर्पल हार्वेस्ट” ब्रांड के तहत ऐसी फसलों का उत्पादन शुरू किया जो आम फसलों के मुकाबले सेहत के लिए अधिक फायदेमंद है।
- विशेष तत्व: इन फसलों में प्राकृतिक रूप से ‘एंथोसाइनिन’ पाया जाता है, जो इन्हें विशिष्ट बैंगनी रंग और औषधीय गुण प्रदान करता है।
- बीजों का चयन: उन्होंने असम से धान की विशेष किस्में और पंजाब से गेहूं की उन्नत किस्में मंगवाकर उन्हें अपने क्षेत्र की जलवायु के अनुकूल तैयार किया।
सामूहिक खेती और उर्जा कृषि FPO
इस सफलता की असली रीढ़ ‘उर्जा कृषि किसान उत्पादक कंपनी लिमिटेड’ (FPO) है। इस मॉडल के जरिए किसानों को संगठित किया गया:
- लागत में कमी: सामूहिक खेती से बीज, खाद और संसाधनों का खर्च कम हुआ।
- विपणन और ब्रांडिंग: उत्पादों की एकीकृत ब्रांडिंग और सीधे विपणन से किसानों को अपनी उपज का बहुत बेहतर मूल्य मिलने लगा।
- छोटों को सहारा: यह मॉडल विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के लिए आत्मनिर्भर बनने का जरिया बना है।
पूर्णतः जैविक और प्राकृतिक पद्धति
इस खेती मॉडल में रासायनिक खादों और जहरीले कीटनाशकों को पूरी तरह से प्रतिबंधित किया गया है।
- गौ-आधारित खेती: यहाँ खाद और कीटनाशक के रूप में गाय के गोबर, गोमूत्र और दूध से बने उत्पादों का ही उपयोग होता है।
- मिट्टी का सुधार: इस पद्धति से न केवल लागत कम हुई है, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता और फसलों की पौष्टिकता में भी भारी सुधार आया है।
स्वास्थ्य लाभ: क्यों है इसकी भारी मांग?
बैंगनी फसलों की सबसे बड़ी खासियत उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की शक्ति है:
- बीमारियों से बचाव: यह हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह (Diabetes) और उच्च रक्तचाप जैसी गंभीर समस्याओं के जोखिम को कम करने में सहायक है।
- मानसिक स्वास्थ्य: यह तनाव कम करने और संपूर्ण स्वास्थ्य सुधार में भी मददगार साबित हुई है।
आर्थिक लाभ का गणित: कितनी हुई आय?
इस मॉडल ने किसानों की आर्थिक स्थिति को पूरी तरह बदल दिया है:
- बैंगनी धान: इससे प्रति हेक्टेयर लगभग ₹1,60,000 तक की आय प्राप्त हो रही है।
- बैंगनी गेहूं: इसकी खेती से प्रति हेक्टेयर लगभग ₹87,500 तक का लाभ मिल रहा है।
- वैल्यू एडिशन: धान से चावल और गेहूं से विशेष स्वास्थ्यवर्धक आटा तैयार कर उसे ब्रांडेड पैकिंग में बेचने से मुनाफा कई गुना बढ़ गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q.1: बैंगनी धान और गेहूं का रंग प्राकृतिक है या आर्टिफिशियल?
उत्तर: यह पूरी तरह प्राकृतिक है। इनमें ‘एंथोसाइनिन’ पिगमेंट होता है जो इन्हें प्राकृतिक रूप से बैंगनी रंग देता है।
Q.2: क्या बैंगनी गेहूं की पैदावार सामान्य गेहूं से कम होती है?
उत्तर: नहीं, वैज्ञानिक पद्धति और सही पोषण (जैविक खाद) से इसकी पैदावार सामान्य किस्मों के बराबर ही ली जा सकती है।
Q.3: इन फसलों के सेवन से क्या फायदे हैं?
उत्तर: इनमें प्रचुर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट होते हैं जो कैंसर, शुगर और दिल की बीमारियों से लड़ने में मदद करते हैं।
Q.4: इनके बीज कहाँ से मिल सकते हैं?
उत्तर: बैंगनी गेहूं के बीज पंजाब के अनुसंधान संस्थानों (NABI) और धान की किस्में असम या सफल किसान समूहों से प्राप्त की जा सकती हैं।
Q.5: क्या इन्हें उगाने के लिए रासायनिक खाद चाहिए?
उत्तर: बिल्कुल नहीं, यह मॉडल पूरी तरह गौ-आधारित प्राकृतिक खेती पर निर्भर है, जिससे लागत न्यूनतम रहती है।
Q.6: एक हेक्टेयर में कितनी कमाई संभव है?
उत्तर: बैंगनी धान से ₹1.6 लाख और गेहूं से लगभग ₹87,500 तक की शुद्ध आय प्रति हेक्टेयर हो सकती है।
Q.7: इसकी मार्केटिंग कैसे की जाती है?
उत्तर: “न्यूट्री-पर्पल हार्वेस्ट” जैसे ब्रांड बनाकर सीधे बाजार या ऑनलाइन माध्यम से ग्राहकों तक पहुँचाया जाता है।
Q.8: क्या उत्तर भारत के किसान इसे उगा सकते हैं?
उत्तर: हाँ, छत्तीसगढ़ में सफल प्रयोग के बाद यह स्पष्ट है कि उत्तर भारत की मिट्टी और जलवायु भी इसके लिए अनुकूल है।
Q.9: मूल्य संवर्धन (Value Addition) क्यों जरूरी है?
उत्तर: अनाज को सीधे बेचने के बजाय आटा या चावल बनाकर बेचने से ब्रांड की पहचान बनती है और लाभ भी बढ़ता है।
Disclaimer: khetkisan.com पर दी गई यह जानकारी एक सफल किसान की केस स्टडी और उपलब्ध रिपोर्टों पर आधारित है। खेती की आय और परिणाम स्थानीय जलवायु, मिट्टी की स्थिति और प्रबंधन पर निर्भर करते हैं। कोई भी नया प्रयोग करने से पहले अपने क्षेत्र के कृषि विशेषज्ञों से सलाह जरूर लें।

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